मैं एक सदी से बैठी हूँ इस राह से कोई गुज़रा नहीं कुछ चाँद के रथ तो गुज़रे थे पर चाँद से कोई उतरा नहीं आकाश बड़ा बुढा बाबा सब को कुछ बाँटते जाता है आँखों को निछोडा मैंने बहुत पर कोई आंसू उतरा नहीं
Post a Comment
No comments:
Post a Comment