कोरी चुनरिया आत्मा मोरी
मैल है माया जाल
वोह दुनिया मोरे बाबुल का घर,
ये दुनिया ससुराल
हाँ जाके, बाबुल से,
नज़रे मिलाऊ कैसे, घर जाऊ कैसे
लागा, चुनरी में दाग...
Tuesday, August 09, 2011
दाग
राह
मैं एक सदी से बैठी हूँ
इस राह से कोई गुज़रा नहीं
कुछ चाँद के रथ तो गुज़रे थे
पर चाँद से कोई उतरा नहीं
आकाश बड़ा बुढा बाबा
सब को कुछ बाँटते जाता है
आँखों को निछोडा मैंने बहुत
पर कोई आंसू उतरा नहीं
राह
इक दूर से आती है पास आके पलटती है
इक राह अकेली सी रुकती है न चलती है
ये सोच के बैठी हु इक राह तो वोह होगी
तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है
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