एहतराम
यह मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिनअब आ गया है तो दो दिन पयाम करता चलूँ …
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो
न मैं तुमसे कोई उम्मीद रक्खूँ, दिल नवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो
तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो
A tribute to the great Ravi.......
कोरी चुनरिया आत्मा मोरी
मैल है माया जाल
वोह दुनिया मोरे बाबुल का घर,
ये दुनिया ससुराल
हाँ जाके, बाबुल से,
नज़रे मिलाऊ कैसे, घर जाऊ कैसे
लागा, चुनरी में दाग...
मैं एक सदी से बैठी हूँ
इस राह से कोई गुज़रा नहीं
कुछ चाँद के रथ तो गुज़रे थे
पर चाँद से कोई उतरा नहीं
आकाश बड़ा बुढा बाबा
सब को कुछ बाँटते जाता है
आँखों को निछोडा मैंने बहुत
पर कोई आंसू उतरा नहीं
इक दूर से आती है पास आके पलटती है
इक राह अकेली सी रुकती है न चलती है
ये सोच के बैठी हु इक राह तो वोह होगी
तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है