Wednesday, January 08, 2014

 एहतराम

यह मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन
अब आ गया है तो दो दिन पयाम करता चलूँ …

Saturday, June 15, 2013

പ്രണയമേ നിന്നിലേക്ക് ‌ നടന്നൊരെൻ വഴികൾ ഓർത്തെന്റെ പാദം തണുക്കുവാൻ......

Tuesday, March 27, 2012

सबब

दिल के लुटने का सबब पूच्छो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, यह कहानी फिर सही

चोट

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया
इस का रोना नहीं क्यूं तुमने किया दिल बर्बाद
इस का ग़म है के बहुत देर में बर्बाद किया

Wednesday, March 07, 2012

चलो एक बार फिर से

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रक्खूँ, दिल नवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो



A tribute to the great Ravi.......



Monday, December 05, 2011

जब तलक न ये तेरे रस के भरे होठों से मिले
यूँही आवारा फिरेगा ये तेरे जुल्फों के तले
गाये जाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए

दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे न कहीं
गीत नाज़ुक है मेरा शीशे से भी टूटे न कहीं
गुनगुनाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए

Thursday, October 27, 2011

जानता हूँ आपको सहारे की ज़रूरत नहीं
मैं सिर्फ साथ देने आया हूँ

Tuesday, August 09, 2011

दाग

कोरी चुनरिया आत्मा मोरी

मैल है माया जाल
वोह दुनिया मोरे बाबुल का घर,
ये दुनिया ससुराल
हाँ जाके, बाबुल से,
नज़रे मिलाऊ कैसे, घर जाऊ कैसे
लागा, चुनरी में दाग...

राह

मैं एक सदी से बैठी हूँ

इस राह से कोई गुज़रा नहीं
कुछ चाँद के रथ तो गुज़रे थे
पर चाँद से कोई उतरा नहीं


आकाश बड़ा बुढा बाबा
सब को कुछ बाँटते जाता है
आँखों को निछोडा मैंने बहुत
पर कोई आंसू उतरा नहीं

राह

इक दूर से आती है पास आके पलटती है

इक राह अकेली सी रुकती है न चलती है
ये सोच के बैठी हु इक राह तो वोह होगी
तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है