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raaz-e-dil
Tuesday, March 04, 2008
मेरा घर
मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
ये घर जो हैं चारों तरफ से खुला हैं
न दस्तक ज़रूरी, न आवाज़ देना
मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है
है दीवारें गुम और छत भी नहीं
Monday, March 03, 2008
मुकम्मल
तेरे जहाँ में ऐसा नहीं के प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहां नहीं मिलता
फुर्सत
बर्फीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर
वादी में गूंजती हुई खामोशियाँ सुने
आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिए हुवे
दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन....
आंसू
आज सोचा तो आंसू भर आये
मुद्दतें हो गयी मुस्कुराए
Monday, February 04, 2008
साहिल
पहले पहल जब तेरे लभों पर आया मेरा नाम
हरदम हरपल याद रहेगी वह साहिल की शाम
मायूसी
आज तो दिल की बात कह दी है
तुम सुनो न सुनो, तुम्हारी ख़ुशी
अपनी मायूस हसरतें लेकर
हम चले आये हैं, सनम की गली
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Dr. Shaji Alungal
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी.....
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