Tuesday, December 28, 2004

एहसान

खुशबू जो लुटाती हैं, मसल्थी हैं उसीको
एहसान का बदला,यही मिलता हैं कलि को.

दोस्ती

हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए हैं
जिंदा तो हूँ जीने की अदा भूल गए हैं